बेटियाँ और भ्रूण हत्या

क्यों ये यहाँ कोख में मर रही हैं
रोशन जहाँ बेटियाँ कर रही हैं

कितनी भले ही पढ़ी है पढ़ाई
बदला नजरिया न बदली बुराई
क्यों खूबियाँ मन मुकर सी रही हैं
रोशन जहाँ बेटियाँ कर रही हैं

गाड़ी सड़क पे, चले लोह पथ पे,
या व्योम में, बेटियाँ सब गमथ पे,
कम किस जगह बेटियाँ पर रही हैं
रोशन जहाँ बेटियाँ कर रही हैं

ठग कुछ बने चोर डाकू लुटेरे
माँ बाप का धन मिले, माल्य फेरे
जितने गये आज तक जो लपेटे
सारे रहे देख मक्कार बेटे

कब बेटियाँ ये सभी बन रही हैं
माँ बाप पर कब कहो तन रही हैं
घर को यही आज कर घर रही हैं
रोशन जहाँ बेटियाँ कर रही हैं

-नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष
श्रोत्रिय निवास बयाना

 

बेटियाँ और भ्रूण हत्या | यह कविता उन तमाम व्यक्तियों, समुदायों, व तथकथित धर्म के उन ठेकेदारों को जाग्रत करने के लिये है जो बेटियों को जन्म से पहले ही लिंग परीक्षण करवा कर कोख में ही मरवा डालते हैं ।

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